नई दिल्ली/काबुल (विशेष संवाददाता)
अफ़गानिस्तान के अल्पसंख्यक सिख समुदाय के प्रतिनिधि और
पूर्व सांसद नरेंद्र सिंह खालसा का जीवन संघर्ष और आस्था का
एक अनूठा उदाहरण है। कभी काबुल की संसद में सिख-हिंदू
समुदाय की आवाज़ रहे खालसा को 2021 में तालिबान के
कब्ज़े के बाद अपना सब कुछ छोड़कर भारत आना पड़ा।
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◼ पिता की शहादत से मिली संसद की सीट
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नरेंद्र सिंह खालसा के पिता अवतार सिंह खालसा अफ़गान
सिखों के बड़े नेता थे। 2018 में जलालाबाद में आत्मघाती हमले
में उनकी शहादत के बाद नरेंद्र सिंह खालसा को यह सीट मिली।
उन्होंने संसद में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता
की आवाज़ बुलंद की।
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◼ भारत में दर्दभरी वापसी
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अगस्त 2021, तालिबान का काबुल पर कब्ज़ा…
नरेंद्र सिंह खालसा और उनका परिवार भारतीय वायुसेना की
विशेष उड़ान से दिल्ली लाया गया।
दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरते ही खालसा की आंखों से आंसू
निकल पड़े। मीडिया से भावुक होकर बोले –
“बीस वर्षों में जो कुछ भी बनाया था, सब खत्म हो गया। सब कुछ शून्य हो गया।”
उनके चेहरे की पीड़ा ने पूरी दुनिया को अफ़गान सिखों की
दशा का एहसास करा दिया।
भारत में उन्होंने सिख शरणार्थी परिवारों के साथ समय बिताया,
फिर कनाडा में अफ़गान सिख प्रवासी समुदाय से जुड़े।
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◼ तालिबान की संपत्ति वापसी और अफ़गान लौटने का साहस
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अप्रैल 2024 में तालिबान सरकार ने घोषणा की कि हिंदू और
सिख अल्पसंख्यकों की जब्त की गई कुछ संपत्तियाँ लौटाई जाएंगी।
इसके लिए Land-Grabbing Prevention and Restitution Commission का गठन हुआ, जो कब्ज़ाई गई ज़मीन और
धरोहरों को वापस कर रहा है
(Source : India Today, Mint, Times of India)।
स्थानीय मीडिया के अनुसार खालसा ने कनाडा से अफ़गानिस्तान
वापस लौटने का निर्णय लिया।
The Wire, Afghanistan International और अन्य मीडिया
रिपोर्ट्स में इसे एक सकारात्मक संकेत बताया गया।
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◼ निजी संपत्ति का रहस्य
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अभी तक उनकी व्यक्तिगत संपत्ति—कहाँ, कितनी, और किस
प्रकार की—का आधिकारिक विवरण सार्वजनिक नहीं है।
परंतु उनकी वापसी यह दिखाती है कि यह केवल संपत्ति के लिए
नहीं, बल्कि अपने समुदाय की परंपराओं और धार्मिक धरोहरों को
जिंदा रखने का संकल्प है।
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◼ प्रतीकात्मक संदेश
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नरेंद्र सिंह खालसा की कहानी बताती है कि सत्ता और धन
क्षणभंगुर हो सकते हैं, परंतु संघर्ष और विश्वास से पुनर्निर्माण
हमेशा संभव है।
उनका सफ़र हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जिसने विपरीत
परिस्थितियों में अपनी जड़ों और विश्वास को थामे रखा।
यह कहानी केवल अफ़गान सिखों की नहीं, बल्कि उन सभी की
है जिन्हें अपने घर-देश से उजड़ना पड़ा और फिर भी उम्मीद की
रोशनी ढूंढी।
