श्राद्ध : श्रद्धा और परंपरा से जुड़ा पवित्र अनुष्ठान । जानिए देव, ऋषि और पितृ तर्पण विधि ।

नई दिल्ली, 8 सितंबर 2025
सनातन धर्म में तर्पण का विशेष स्थान है। यह वह पवित्र विधि है जिसके द्वारा हम अपने देवताओं, ऋषियों, पितरों और समस्त जीवों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं। विशेष रूप से श्राद्ध पक्ष में, तिल मिश्रित जल, जौ, चावल, पुष्प और अन्य सामग्री अर्पित कर यह अनुष्ठान किया जाता है। आइए जानते हैं तर्पण का महत्व, विधि और इसके प्रकार।


तर्पण क्या है?

‘श्राद्ध’ का अर्थ है श्रद्धा के साथ किया गया कर्म, जो पितरों की तृप्ति और उनके उद्धार के लिए किया जाता है। वहीं ‘तर्पण’ उन जल अर्पण की क्रियाओं को कहा जाता है, जो देवताओं, ऋषियों, पितरों और अन्य जीवों को तिल, जौ और चावल मिश्रित जल प्रदान कर की जाती है। इसे करने से पितरों की आत्मा को शांति, संतोष और मुक्ति प्राप्त होती है।


तर्पण का धार्मिक महत्त्व

शास्त्रों में वर्णित है कि यज्ञ, पूजन और श्राद्ध में तर्पण का विशेष स्थान है। यजुर्वेद में कहा गया है:

“हे अग्नि! जैसे हमारे पितरों ने यज्ञों के द्वारा स्वर्ग प्राप्त किया, वैसे ही हम भी यज्ञ, पाठ और साधनों से ऐश्वर्य प्राप्त करें।”

श्राद्ध पक्ष का विशेष प्रभाव उत्तर भारत, पूर्व भारत, तमिलनाडु, केरल और महाराष्ट्र में देखा जाता है। इसे वहाँ विभिन्न नामों से मनाया जाता है जैसे—आदि अमावसाई, करिकडा वावुबली, पितृ पंधरवड़ा आदि।


तर्पण के प्रकार

तर्पण विभिन्न स्तरों पर किया जाता है। मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं:

  1. देवतर्पण – देवताओं के लिए जल अर्पण
  2. ऋषितर्पण – ऋषियों के लिए जल अर्पण
  3. पितृतर्पण – पितरों के लिए जल अर्पण
  4. मनुष्यतर्पण – दिव्य मनुष्यों के लिए अर्पण
  5. यमतर्पण – यमराज व उनके गणों के लिए अर्पण
  6. मनुष्यपितृतर्पण – अपने पूर्वजों के लिए अर्पण
  7. भीष्मतर्पण – भगवान भीष्म को जल अर्पण

तर्पण की विधि – चरणबद्ध प्रक्रिया

1️⃣ संकल्प करना

पूर्व दिशा की ओर मुख करके, गायत्री मंत्र से शिखा बाँधकर, कुशा की पवित्री धारण कर संकल्प करें:

“ॐ विष्णवे नम:। हरि: ॐ तत्सदद्यैतस्य… अमुकगोत्रोत्पन्न: अमुकशर्मा अहं देवर्पिमनुष्यपितृतर्पणं करिष्ये।”

2️⃣ देवतर्पण

जल में चन्दन, अक्षत, पुष्प, तुलसी डालकर ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि देवताओं को अर्पण करें।

3️⃣ ऋषितर्पण

मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलह, वसिष्ठ आदि ऋषियों के लिए जल अर्पण।

4️⃣ मनुष्यतर्पण

सनक, सनन्दन, कपिल आदि दिव्य पुरुषों के लिए जल अर्पण।

5️⃣ पितृतर्पण

काला तिल मिलाकर जल अर्पित करते हुए कव्यवाडनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्त आदि पितरों को तर्पण करें।

6️⃣ यमतर्पण

यमराज, धर्मराज, काल, चित्रगुप्त आदि के लिए जल अर्पण।

7️⃣ मनुष्यपितृतर्पण

अपने पिता, पितामह, प्रपितामह तथा मातृकुल के लिए नाम-गोत्र सहित तर्पण करें।

8️⃣ भीष्मतर्पण

भगवान भीष्म को विशेष जल अर्पण कर उन्हें स्मरण करें।


अर्घ्यदान और सूर्य को जल अर्पण

तर्पण के पश्चात शुद्ध जल से आचमन कर प्राणायाम करें। फिर षडदल कमल बनाकर ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, सूर्य आदि देवताओं को अर्घ्य अर्पित करें। अंत में सूर्य देव को अर्घ्य देकर दिशाओं को प्रणाम करें।


जल का समर्पण और अंतिम प्रार्थना

तर्पण का जल मुख पर लगाकर “ॐ अच्युताय नमः” का जप करें और समर्पण मंत्र से इसे भगवान को अर्पित करें:

“ॐ तत्सद् कृष्णार्पणमस्तु।”


विशेष नोट

यदि तर्पण नदी में किया जाए तो दोनों हाथों से जल लेकर गौ माता की सींग जितना ऊँचा उठाकर जल अर्पित करें। वार्षिक श्राद्ध जैसे अवसरों पर वस्त्र निष्पीडन नहीं करना चाहिए।


निष्कर्ष

तर्पण केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि यह हमारे पूर्वजों, ऋषियों और समस्त जीवों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का पवित्र माध्यम है। यह हमें मृत्यु से अमृत की ओर ले जाने वाला अनुष्ठान है, जो आत्मा की शांति, मानसिक संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है। श्रद्धा और विधिपूर्वक किए गए इस अनुष्ठान से व्यक्ति अपने परिवार और पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त करता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!